Friday, January 25, 2019



राजपूत क्रन्तिकारी राणा रतन सिंह सोढा (अमरकोट/उमरकोट- पाकिस्तान ) 1850

राजपूत क्रन्तिकारी राणा रतन सिंह सोढा (अमरकोट/उमरकोट- पाकिस्तान ) 1850

राणा रतन सिंह सोढा एक बहादुर लीजेंड थे ,जिन्होंने ब्रिटिश नियुक्त स्थानीय ऑफिसर सईद मोहम्मद अली जो ब्रिटिश भारत के तहत राजस्व संग्रह के लिए जिम्मेदार थे को चुनौती दी थी, और अंततः मोहम्मद अली को उमरकोट की जनता पर विभिन्न करो और अवांछित अत्यचार के कारण रतन सिंह ने मार डाला था, लगभग 6 महीने की लड़ाई के बाद राणा रतन सिंह अपने सहयोगी भागू के साथ पकडे जाते है और उनको उमरकोट के किले पर फांसी पर लटका दिया जाता है. उनकी मौत के बाद उनके सहयोगी भागू जी को अंडमान जेल में काला पानी के लिए भेजा गया .
राणा रतन सिंह का जन्म साधारण सोढा *सुरताण सोढा * परिवार में हुआ था , उन्हें जनता के प्रेम के कारण उन्हें राणा कहा जाता था , अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने पर ,उन पर कंपनी ने इनाम और सूली की सजा सुनाई ,कई महीनों की फरारी के बाद एक दिन वे थक कर सो रहे थे , और अंग्रेजी टुकड़ी उन्हें पकड़े पहुंची तभी उनकी प्रिय घोड़ी ने उन्हें चेताने की काफी कोशिश की परन्तु वे नही उठे , उसके बाद  अमर कोट में उन्हें सूली की सज़ा हुई , उन्हें सूली पर चढ़ाने पर उन्होंने कहा था कि मुझे सूली मेरी भुआ सा के हाथों दी जाए , कंपनी ने तार भेज कर सूली रुकवाने का आदेश दिया था परन्तु , तार को ककड़ जाति के बणियो ने , समय पर नही दिया , जब उनकी सूली की रस्सी को खिंचा जा रहा था उस समय ककड़ बणियो ने तार सरकार को दिखाया, और सरकार ने सजा रुकवाने का आदेश दिया, इस पर राणा रतन सिंह ने कहा की मै राजपूत हु सूली चढ़ गया आज अब उतरूंगा नही , इस पर उनकी भुआ सा ने उन्हें सूली दी , और उस दिन के बाद सूली अमरकोट में कभी किसी को नही दी गयी , उनकी घोड़ी अमर कोट के किले की दीवारे कूद कर आई , तभी सैनिक के भाले से उसका पेट फट गया उसके पेट में लोग कहते हैं कि पंख वाला बिछेरा था ,घोड़ी के पैर आज भी किले पर मौजूद है ,
 मरते समय राणा ने ककड़ बणियो को श्राप दिया था , पहले पाकिस्तान में बड़ी तादाद में थे अब उनकी पीढ़ी भी नष्ट हो गयी , आज भी ककड़ बणियो का पानी सोढा नही पीते
राणा रतन सिंह के अपने सर्वोच्च बलिदान के कारण सिंध में आज भी उनकी लोककथाओं को स्थानीय गीतों में गाया जाता है “म्हारा रतन राणा एकरे निजरा रो मेलो देख ,म्हारा सायर सोडा एकरे अमरने घुद्लो फैर “ !!

                  लेख -कुँवर मनोज सिंह सोढा
           *बुजुर्ग सरदारों से ,एवं सिंध रिव्यू के 

Thursday, January 24, 2019

लेफ्टिनेंट जनरल महाराजाधिराज श्री सर प्रताप_सिंह साहिब बहादुर जोधपुर ईडर

राजपूत महान लेफ्टिनेंट जनरल मारवाड़ धणी और आदर्श सेना पति  तुझे नमन ऐसा योद्धा जिसका  सीना बहादुरी  मेडल्स के लिए कम पड़ता था
 #लेफ्टिनेंट_जनरल__महाराजाधिराज_श्री_सर_प्रताप_सिंह_साहिब_बहादुर_जोधपुर_ईडर         
प्रताप सिंह का जन्म 21 अक्टूबर 1845 को हुआ  राजराजेश्वर श्री महाराज तख्त सिंह  जी साहेब बहादुर जोधपुर के द्वितीय पुत्र थे  तख्त सिंह के   देवलोकगमन के बाद जोधपुर का महाराजा श्री राज राजेंद्र जसवंतसिंह साहेब को नियुक्ति किया गया सर महाराजा प्रताप सिंह जी ने ब्रिटिश सेना में अपनी जोधपुर की सेना के साथ 2 अफगान युद्ध लड़ा ,तिराह युद्ध नेतृत्व ,बॉक्सर रेबलेन और प्रथम विश्व युद्ध लड़ा  सन 1878 में  राज्य में जोधपुर दीवान फैज़ुला खान ने राज्य में अव्यवस्था फैला दी इसके बाद महाराजा ने अपने भ्राता सर् महाराज प्रताप सिंह को जोधपुर का प्रधानमंत्री बनने का आग्रह किया  और महाराज प्रताप सिंह जी ने इसे स्वीकार किया और सेवा देना प्रारंभ किया, सर प्रताप ने जोधपुर लॉन्चर और जोधपुर रसाला ,राजपुताना रेजिमेंट का पदभार ग्रहण करते हुए जोधपुर मारवाड़ का सबसे ज्यादा विकास किया महाराज साहेब गरीबो और जनता के सम्मानिय थे
सन 1895 में महाराजा राजजेश्वर जसवंत सिंह जी के निधन के बाद महाराजकुमार सरदार सिंह जी साहेब को अल्प आयु महाराजा जोधपुर बनाया गया , सर प्रताप सिंह जी ने सरदार सिंह के शासन काल मे अपनी सेवा जारी रखी ,आकस्मिक महाराजा साहेब सरदार सिंह के निधन के बाद उनके ज्येष्ठ युवराजकुमार सुमेर सिंह जी साहेब को मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में राजगद्दी पर नियुक्त किया गया ,राज्य संचालन के लिए तीसरी बार रीजेंसी कॉंसिल बनायी गयी क्योंकी इस बार भी महाराजा साहेब की उम्र छोटी थी 14-15 की आयु में महाराजा सुमेर सिंह प्रथम विश्व युद्ध मे सर प्रताप सिंह के साथ भाग लिया उन्हें अंग्रेज सरकार की तरफ से कई मेडल्स से समानित किया गया वापिस भारत आने के बाद नमुनिया से महाराजा सुमेर सिंह जी म्रत्यु हुई उन्हें 7 वर्ष राज किया ,उनके पुत्र न होने के कारण उनके छोटे भाई महाराजा उमेद सिंह जी को राजा नियुक्त किया गया ,महाराज श्री सर प्रताप सिंह जी ने 1873 से 1922 तक जोधपुर राज्य में प्रधानमंत्री पद पर सेवा दी ,1887 में उन्हें रानी विक्टोरिया के 50 वर्ष शासन के पूर्ण होने पर लंदन में महाराजा साहेब जसवंतसिंह जी बहादुर ने सर प्रताप सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि से सम्मनित किया । राजपूत राजाओं में वो प्रथम राजपूत थे जो बम्बई से यूरोप जिन्होंने पानी के मार्ग से यात्रा की ,यात्रा के दौरान ही आप ने थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीखी और जिससे वे महारानी विक्टोरिया से बात करते थे , महारानी के समक्ष प्रथम बार गए तो उन्होंने उन्हीं के अंदाज में महारानी का हाथ चूमा और उनके हाथ को अपनी आंखों से साफ किया इस घटना से खुश होकर प्रिंस वेल्स ने अपना अंगरक्षक नियुक्त किया ,एक बार अचानक महारानी ने भोजन के दौरान महाराज सर प्रताप सिंह जी का नाम पुकारा तो उनके पास भेंट रूपी कुछ नही था ,इस दौरान उन्होंने अपने साफे का स्वर्ण पेंच निकाल भेंट किया और महारानी बहुत खुश हुई और अगले दिन अपने ड्रेस पर स्वर्ण पेंच लगा कर कहा कि आपकी भेंट मेरे दिल के पास है ,सर प्रताप सिंह ने विक्टोरिया शासन के 50 वर्ष पूरे होने पर जोधपुर राइका बाग रेलवे स्टेशन के सामने जुबली कोर्ट का निर्माण करवाया ,कोर्ट में आज भी सर प्रताप सिंह की प्रतिमा लगी हुई है
सर महाराजा प्रताप सिंह जी ने ब्रिटिश सेना में अपनी जोधपुर की सेना के साथ 2 अफगान युद्ध लड़ा ,तिराह युद्ध नेतृत्व ,बॉक्सर रेबलेन और प्रथम विश्व युद्ध लड़ा। उनकी बहादुरी और वीरता से खुश होकर ब्रिटिश साम्राज्य ने कई पदों और मेडलों से समानित किया
#प्रथम_विश्व_युद्ध_में_सर_का_योगदान
महाराज साहेब सर प्रताप सिंह को प्रथम विश्व युद्ध मे इजरायल भेजा गया यहाँ पर उन्होंने हाइफा और अल्लेपा के युधो में अपना योगदान दिया।

 जनरल सर प्रताप सिंह अपने जोधपुर लांसर्स के साथ एक रात और एक दिन के दौरान नासरत में अपनी 70 मील की सवारी पर गए थे। 73 साल से कम उम्र के, साम्राज्य का वफादार योद्धा एलनबी के शब्दों में
इस युद्ध में सर प्रताप और  कर्नल हिज हाइनेस राज राजेश्वर सरमद-राजा- ए -हिंदुस्तान महाराजाधिराज महाराजा श्री सर सुमेर सिंघजी साहिब बहादुर, महाराजा ऑफ जोधपुर,भी युद्ध में गए । प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जोधपुर की घुड़सवार फौजे भेजी गई। यह फौज जिसका नाम जोधपुर लारेंस था, सबसे पहले इस युद्ध में स्वेज कैनाल पहुंची। इस फौज को भेजने के लिए यहां से तीन स्पेशल ट्रेनें लगाई गई और इसमें घुड़सवार और सैनिकों को रवाना किया, जो अहमदाबाद होते हुए मुंबई पहुंची। जहां से शिप के माध्यम से ये स्वेज कैनाल पहुंचे यहाँ से होते हुए हाइफा इजरायल पहुंचे
#लेफ्टिनेंट_जनरल_महाराजा_सर_प्रताप सिंह जी साहेब ने #इजरायल में अपनी सूझ बुझ रण नीति से बिना बंदूकों और टोफो के तलवार के बल पर दुश्मन की टोफो को तोड़ युद्घ हैफा विजय करवाया  ,यहां हमारी जोधपुर लारेंस को वीरता दिखाने का मौका मिला। यहां तीन बड़ी-बड़ी लड़ाईयां हुई, तीनों में जोधपुर ने हिस्सा लिया। पहली जॉर्डन वैली, इसमें मेजर दलपत सिंह रावणा राजपूत को मिल्ट्री क्रॉस का अवार्ड मिला। इसके बाद 23 सितम्बर को हाइफा की लड़ाई हुई। जिसकी कमान मेजर दलपत सिंह रावणा और साहेब कैप्टन अमान सिंह जोधा के हाथ में थी, इस युद्ध के दौरान मेजर दलपतसिंह शहीद हो गए और इनकी मृत्य के बाद कैप्टन अमानसिंह जोधा ने कमान संभाली और हाइफा युद्ध में विजय दिलाई।
- इस जंग में बहादुरी के लिए कैप्टन अमन सिंह राठौड़ जोधा बहादुर और दफादर जोर सिंह को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट (आईओएम) दिया गया।
- #जबकि अनूपसिंह और #सरप्रताप के #बेटे #लेफ्टिनेंट #सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस व । कर्नल होल्डन और लेफ्टिनेंट नाइक (अंग्रेजी अफसर) को डीएसओ अवार्ड मिला।
- हाइफा को आजाद कराने के लिए मेजर #दलपत #सिंह की रावणा जांबाजी की वजह से उन्हें इतिहास में '#हीरो ऑफ #हाइफा' के नाम से जाना जाता है। उन्हें भी मिलिट्री क्रॉस से नवाजा गया था। प्रताप सिंह ने ही मेजर दलपतसिंह रावणा को इंग्लैंड पढ़ाई के लिए भेजा था और बाद में अपनी सेना में नियुक्त किया
इस युद्ध के लिए जोधपुर लारेंस 29 अगस्त 1914 को रवाना हुई और दो फरवरी 1920 को लौटी। इस युद्ध में हमारे आठ सैनिक मरे, 34 घायल हुए। इसके अलावा हमारे 63 घोड़े मारे गए और 80 घोड़े घायल हुए। जबकि हमारी सेना ने विपक्षी सेना के 80 सैनिक मारे और 1350 को जिंदा पकड़ा। इस युद्ध में 11 मशीनगन, 18 तोपें और बहुत सारा एम्युनेशन जब्त किया

मिलिट्री ऑपरेशन इजिप्ट एंड फलिस्तीन: वॉल्यूम 2 बुक में लिखा है, "इस पूरे कैम्पेन के दौरान राजपूत घुड़सवारों की ऐसी बहादुर दिखी ,तेजी से भागते घोड़ों को रोकने में मशीनगन की बुलेट भी नाकाम थीं।
इस युद्ध में #पूर्व_विदेश_मंत्री _सांसद ,रक्षा मंत्री #जसवंत_सिंह #जसोल के #पिता ठाकुर साहब #सरदार #सिंह  #बहादुर भी थे ।
जनरल सर प्रताप सिंह अपने जोधपुर लांसर्स के साथ एक रात और एक दिन के दौरान नासरत में अपनी 70 मील की सवारी पर गए थे। 73 साल से कम उम्र के, साम्राज्य का वफादार योद्धा एलनबी के शब्दों में था "काफी खटखटाया।" उसे बुखार भी था। एलेनबी ने उसे कुछ दिनों के लिए आराम करने का आदेश दिया, अन्यथा पुराने युद्ध के घोड़े को संदेह नहीं था कि हाइफा में उनके लांसर्स उनकी कार्रवाई में शामिल हो गए। 'थ्रू फिलिस्तीन विद 20 वीं मशीन गन स्क्वाड्रन' के गुमनाम लेखक का मानना है कि  वह केवल मेजर दलपत सिंह रावणा  एमसी का जिक्र कर सकते हैं, और यह अच्छी तरह से हो सकता है कि यह अधिकारी उसी  हरि सिंह का बेटा था जो सर प्रताप का एडीसी था और पोलो का साथी था। यदि ऐसा है, तो यह काफी समझ में आता है कि सर प्रताप को मौत से गहरा दुख हुआ,।
अपने 'हिस्ट्री ऑफ़ द ब्रिटिश कैवलरी' में मार्क्लेस ऑफ़ एंग्लेसी ने इस क्रिया के बारे में अपने विवरण का निष्कर्ष निकाला;
अपनी युद्धकालीन सेवा और जोधपुर के रीजेन्ट के रूप में अंतिम कार्यकाल के बाद, 4 सितंबर 1922 को सिंह जोधपुर में निधन हो गया।
बहादुर राठौड़ राजपूत लेफ्टिनेंट जनरल सर महाराजा प्रताप सिंह जी की
(उपाधियां एवं सम्मान मैडल ,
भारत स्वर्ण पदक -1877 की महारानी
डिस्पैचेस (MID) -1878 में उल्लेख किया गया...
bhaarat svarn padak -1877 kee mahaaraanee...
भारत स्वर्ण पदक -1877 की महारानी
डिस्पैचेस (MID) -1878 में उल्लेख किया गया
अफगानिस्तान मेडल -1878
क्वीन विक्टोरिया गोल्डन जुबली मेडल -1887, डायमंड जुबली बार - 1897 के साथ
डिस्पैचेस (एमआईडी) -1897 में उल्लेख किया गया
द नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (GCSI) -1897 (KCSI-1886) (CSI-1878)
इंडिया मेडल w / क्लस्प -1898
कैसर-ए-हिंद पदक प्रथम श्रेणी -1900
चीन युद्ध पदक - 1901 (जून 1902 में एक दर्शक के रूप में उन्हें किंग एडवर्ड सप्तम द्वारा व्यक्तिगत रूप से पदक प्राप्त हुआ, जब उन्होंने किंग्स की ताजपोशी में भाग लेने के लिए लंदन का दौरा किया [7])
किंग एडवर्ड VII कोरोनेशन मेडल -1902, दिल्ली दरबार क्लैस-1903 के साथ
किंग जॉर्ज पंचम कोरोनेशन मेडल -1911, दिल्ली दरबार क्लैप के साथ
रॉयल विक्टोरियन ऑर्डर (GCVO) -1911 का नाइट ग्रैंड क्रॉस
1914 स्टार - 1918के
ब्रिटिश युद्ध पदक - 1918
इंटर-एलाइड विक्ट्री मेडल - 1918
GCB: द ऑर्डर ऑफ़ द बाथ -1918 (KCB-1900) का मानद नाइट ग्रैंड क्रॉस (केCB-1898)
केसीबी (एम): मानद नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द बाथ (सैन्य प्रभाग) - 29 नवंबर 1900 - चीन में हालिया ऑपरेशन (बॉक्सर विद्रोह) के दौरान सेवाओं की मान्यता। [3] जून 1902 में एक ऑडियंस के दौरान उन्हें किंग एडवर्ड सप्तम द्वारा व्यक्तिगत रूप से निवेश किया गया था, जब उन्होंने किंगो राज्याभिषेक में भाग लेने के लिए लंदन का दौरा किया। [7]
मिस्र के नील नदी के आदेश का ग्रैंड कॉर्डन -1918
लीजन डी'होनूर -1918 के ग्रैंड ऑफिसर
जोधपुर महान युद्ध पदक -1919
ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ रोमानिया -1921

           -----लेख सहभार कुँवर मनोज सिंह सोढा
*इतिहास से ,पुराने अखबार , योद्धाओं के परिजनों से प्राप्त , मानव गलती करता है ,कोई मेने भी की होगी ,

रुद्रमाणु भगवान महादेव की कविता by Manoj singh

वात्याचक्र

मृगतृष्णा रावण की लंका  वात्याचक्र समाया हैं देव कैद पड़े हैं इसमें  प्रगल्भ भी समझ ना पाया हैं अब अंधियारा और नहीं  औऱ किसी और का शोर नहीं ...