Thursday, March 21, 2019

                पृथ्वीराज चौहान
वो महावीर वो कपुरवर्णी जिसकी गजब भुजाएँ थी ,

क्या कहना उस अजय वीर का उस पे भवानी राजी थी।।

    शब्द भेद्य -धनुर्रधारी वो पृथ्वीराज बलशाली था,
    राजपूत सम्राट औऱ चमकता हिंदुआ सूर्य था ।।

उसी समय इक बात घटी, भारत की स्वार्णिम चिड़िया पर ,
       मोहम्मद गौरी की नज़र पड़ी।
 गजनी से कुछ सैनिक लेकर, गौरी सरहद पर अकड़ खड़ा ,
       तब पृथ्वीराज भी निकल पड़ा,
  तब जाग उठा क्षत्रित्व सबका, बात आन पे आयी थी,
   हर राजपूत सैनिक ने बोली   ,हर-हर शम्भु की बोली थी।।

इस घमासान रण में क्षत्रियों ने, सब दुष्टों को काट दिया
गौरी बचा पीछे  जब रण में , पृथ्वी ने उसको पटक दिया।।

तब सैन्यपति बोलै पृथ्वी से, काट चलो गर्दन गौरी की,
 वो चीख़-चीख कर बोल उठा, 
राजन मुझको माफ करो ,मै धूल तुम्हारे चरणों की,
मै शरण तुम्हारे आया हु ,यह सुनकर सिंह भी पिघल गया,।
दया दिखाई राजन ने , गौरी को जिंदा छोड़ दिया।।
  
फिर भी नही माना गौरी , भारत पर सत्रह बार चढ़ा ,
मुँह की खाकर ,पृथ्वी से 
     भीख मांगकर निकल बचा ,पर दया दिखाई “ पृथ्वी  " ने, 
                गौरी को जिंदा छोड दिया।।
इस बार युद्ध मे गज़ब हुआ, जयचंद गौरी का मिलन हुआ 
   दुष्टो के संग मिलकर जयचंद ने,  भारत माँ को बेच दिया।
   जयचंद और पृथ्वीराज रिश्ते में दोनो भाई थे ,
दिल्ली दरबार की लालच में , कन्नौजी जयचन्द फिसल गया।।

अपनी सेना ले जयचन्द ,गौरी संग , पृथ्वीराज पे टूट पड़ा
सब भेद बताये जयचन्द ने , धोखे से पृथ्वी को पकड़ लिया।
आँख फोड़ के पृथ्वीराज की , लेकर उसे अफ़ग़ान चला ।।

पृथ्वी को क्रुर गौरी ने , छ महीने तक भूखा रख गहरे कुएं में डाल 
 तब चन्द्र बरदाइ वहां पहुंच गया , चारण पृथ्वी का प्रेमी था।
       अपनी सर्जन कविता वाणी से , गौरी के मन को मोह लिया
        मिला पृथ्वी से चन्द्र जब , बदला लेने का वचन दिया ।
         इक खेल रखूंगा गौरी संग तेरा , ऐसा पृथ्वी को बोल दिया।।

बोला चन्द्र गौरी से जाकर , 

ये पृथ्वी बडा धनुर् धारी है 
 बिन देखें ही हाथो से , शब्द भेद्य बाण चलाता हैं।
गौरी भी खेल दीवाना था।
खेल सजाया गौरी ने और सात तवे भी टांग दिए
 गौरी ने अपनी वाणी से खेल का यू आगाज किया।।
 
तब चारण चन्द्र बोल पड़ा ,
    चार बांस चोबीस गज ,अंगुल अष्ट पर बाण कहा 
इतने पर है सुल्तान तू मत चुके ,   चौहान कहा।      ।।
  
इतने में वीर का तीर चला सात तवे भी फाड़ चला 
गौरी की गर्दन काट चला , कह ‛‛जय पृथ्वी चौहान ''चला।
गौरी तो नर्क के द्वार चला , इतने में हाहाकार हुआ।।
दोनो मित्रों ने इक दूजे पे , स्वाभिमान खड़ग से वार किया।
  मर कर भी अमर हुए दोनों भारत का ऊंचा नाम किया।।
  
वो महावीर वो कपुरवर्णी , जिसकी गजब भुजाएँ थी ।
क्या कहना उस अजय वीर का उस पे भवानी राजी थी
#कुँवर मनोज सिंह

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