छत्रपति आला जी भाटी
क्या क्षत्राळे यदुओं का बूढा किवाड़ पुराना है
जंहा नज़र पड़े गढ़ से यवनों का आंतक डेरा हैं
तलवार लिए स्वर्णिम गढ़ पर बुढा लूणकरण खड़ा है
उतर के बूढ़े किवाड़ों पर विजय का लेप लगाना हैं
मेघाण्डबर छत्र धारण कर गढ़ त्रिकुट बचाना हैं
हे आलाजी !
पिता तुल्य इस बूढ़े क़िले का अब तो मान बचाना हैं
आमिर अली के आंतक से जैसलमेर बचाना हैं
महारावल के कहते ही केशरिया हो जाता हैं
श्री कृष्ण के पोतों पर महाकाल मँडराता हैं
रक्त रंजित तलवार लिए , वो स्वर्णिम गढ़ से जाता है
तलवार तोल , खून खोल ,
अरि में विध्वंश मचाता हैं।,
आला को आते, देख अली, रण में घुट -घुट के घबराता हैं
अरि के टोलों में में वीर आला का भय प्रचंड भर जाता हैं
अरि सेना के शीशों को पल में बेधड कर देता है
युद्ध भूमि मे लड़ने से वो रक्त रंग रंग जाता हैं
अरि की तीक्ष्ण शमशीर वार से मष्तक भी कट जाता हैं
मष्तक के कटते ही धड़ बिन मस्तक लड़ जाता हैं
वीर आला का अश्व तभी पवन पुत्र बन जाता हैं
आमिर अली की सेना पर मृत्यू भय मँडराता हैं
यदुकुल के आंगन में फिर से केशरिया फहराता हैं
जैसमलेर में जौहर होते होते टल जाता हैं
उतर के बूढे किवाड़ों पर विजयी लेप लग जाता हैं
#kunwar manoj singh
