बचपन बीता बादलों में
और जवानी प्रीत में
अब ये झरझर बन चुका है
रीत अब श्मशान तक
जल गया नश्वर यहीं तक
साथ दो गज ना दिया
चलो आत्मा तो अमर हैं
चलो ईश्वर द्वार तक
कभी सुख में कभी दुख में
कभी दुविधा- भार में
जीवन बंधा हैं बेड़ियों में
मुक्ति की अब आश हैं
छूट जाएं प्राण सहसा
जींवन अर्द्घ विराम हैं
-kunwar manoj singh