Saturday, September 28, 2019

जींवन अर्द्घ विराम हैं



बचपन बीता बादलों में
और जवानी प्रीत में
अब ये झरझर बन चुका है
रीत अब श्मशान तक
जल गया नश्वर यहीं तक
साथ दो गज ना दिया
चलो आत्मा तो अमर हैं
चलो ईश्वर द्वार तक

कभी सुख में कभी दुख में
कभी दुविधा- भार में
जीवन बंधा हैं बेड़ियों में
मुक्ति की अब आश हैं
छूट जाएं प्राण सहसा
जींवन अर्द्घ विराम हैं
             -kunwar manoj singh














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